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तीन दोस्त एक ऐसी फिल्म देखने गए जिसमें हीरो एक दिन के लिए मुख्... - लोकतांत्रिक राजनीति
तीन दोस्त एक ऐसी फिल्म देखने गए जिसमें हीरो एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनता है और राज्य में बहुत से बदलाव लाता है। इमरान ने कहा कि देश को इसी चीज़ की ज़रूरत है। रिज़वान ने कहा कि इस तरह का, बिना संस्थाओं वाला एक व्यक्ति का राज खतरनाक है। शंकर ने कहा कि यह तो एक कल्पना है। कोई भी मंत्री एक दिन में कुछ भी नहीं कर सकता। ऐसी फिल्मों के बारे में आपकी क्या राय है?
ऐसी फिल्मों के बारे में लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से मेरी राय निम्नलिखित है:
संस्थाओं का महत्व (रिज़वान का तर्क): रिज़वान की बात सही है। लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति की 'वीरता' से नहीं, बल्कि संस्थाओं (संविधान, कानून, और प्रक्रियाओं) से चलता है। बिना संस्थाओं और नियमों के एक व्यक्ति का शासन तानाशाही का रूप ले सकता है, जहाँ वह अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकता है, जो कि खतरनाक है।
प्रक्रिया और कानून (शंकर का तर्क): शंकर का तर्क व्यावहारिक है। वास्तविक जीवन में कोई भी बदलाव लाने के लिए कानून बनाना पड़ता है, बजट की व्यवस्था करनी होती है और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिलकर काम करना होता है। यह सब एक दिन में संभव नहीं है।
जवाबदेही: लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। फिल्मों में दिखाया गया 'त्वरित न्याय' सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन इसमें गलतियाँ होने और निर्दोषों को नुकसान पहुँचने का डर रहता है।
निष्कर्ष: ऐसी फ़िल्में मनोरंजन के लिए तो अच्छी हैं, लेकिन देश को 'सुपरहीरो' की नहीं बल्कि 'मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं' और 'सजग नागरिकों' की ज़रूरत है। रिज़वान और शंकर के तर्क अधिक सही और लोकतांत्रिक हैं।