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आरक्षण पर आदेश का उदाहरण पढ़कर तीन विद्यार्थियों की न्यायपालिका... - लोकतांत्रिक राजनीति
आरक्षण पर आदेश का उदाहरण पढ़कर तीन विद्यार्थियों की न्यायपालिका की भूमिका पर अलग-अलग प्रतिक्रिया थी। इनमें से कौन-सी प्रतिक्रिया, न्यायपालिका की भूमिका को सही तरह से समझती है?
क. श्रीनिवास का तर्क है कि चूँकि सर्वोच्च न्यायालय सरकार के साथ सहमत हो गई है लिहाजा वह स्वतंत्र नहीं है।
ख. अंजैया का कहना है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है क्योंकि वह सरकार के आदेश के खिलाफ़ फ़ैसला सुना सकती थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को उसमें संशोधन का निर्देश दिया।
ग. विजया का मानना है कि न्यायपालिका न तो स्वतंत्र है न ही किसी के अनुसार चलने वाली है बल्कि वह विरोधी समूहों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाती है। न्यायालय ने इस आदेश के समर्थकों और विरोधियों के बीच बढ़िया संतुलन बनाया।
आपकी राय में कौन-सा विचार सबसे सही है?
आपकी राय में 'ख. अंजैया' का विचार सबसे सही है।
कारण:
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि वह अनिवार्य रूप से सरकार के खिलाफ ही फैसला दे। इसका असली अर्थ यह है कि वह बिना किसी दबाव के, संविधान और कानून के आधार पर निर्णय लेती है। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के आदेश की कानूनी वैधता की जाँच की और सरकार को उसमें संशोधन (जैसे कि 'मलाईदार परत' या 'creamy layer' को आरक्षण से बाहर करना) का निर्देश दिया। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है और वह कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा कर उस पर नियंत्रण रख सकती है।