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'हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी खयाल कर... - क्षितिज भाग-1
'हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी खयाल करना चाहिए था।'- उक्त कथन के अनुसार हमारे आचार-व्यवहार के तरीके वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। आपकी समझ से यह उचित है अथवा अनुचित, विचार व्यक्त करें।
सामान्यतः समाज में लोगों के प्रति हमारे आचार-व्यवहार के तरीके उनकी वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। लोग अक्सर अच्छे कपड़े पहनने वाले को सम्मान देते हैं और साधारण या खराब कपड़े पहनने वाले को कमतर आँकते हैं। मेरी समझ से यह अनुचित है, जिसके निम्नलिखित कारण हैं:
चरित्र का पैमाना नहीं: वेशभूषा से केवल व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या पसंद का पता चलता है, उसके चरित्र, ज्ञान, योग्यता या इंसानियत का नहीं।
धोखा संभव: कभी-कभी बहुत सादे कपड़ों में भी महान व्यक्तित्व (जैसे महात्मा गांधी या सादगी पसंद विद्वान) छिपे हो सकते हैं, जबकि महँगे कपड़ों में कोई अपराधी या कपटी व्यक्ति भी हो सकता है।
समानता का अधिकार: यदि हम वेशभूषा के आधार पर व्यवहार करेंगे, तो यह गरीब या साधारण लोगों के प्रति भेदभाव होगा, जो सामाजिक न्याय के विरुद्ध है।
भ्रम: लेखक ने भी भिखारी के वेश में यात्रा की थी, जबकि वे एक महापंडित और विद्वान थे। यदि उनके साथ केवल वेशभूषा देखकर व्यवहार किया जाता, तो यह उनके ज्ञान का अपमान होता।
निष्कर्ष: हमें किसी भी व्यक्ति के गुणों, व्यवहार और मानवता को महत्त्व देना चाहिए, न कि उसके बाहरी पहनावे को। जैसा कि कहा गया है—"सादा जीवन, उच्च विचार।"