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जब यह अध्याय पढ़ाया जा रहा था तो रमेश कक्षा में नहीं आ पाया था... - लोकतांत्रिक राजनीति
जब यह अध्याय पढ़ाया जा रहा था तो रमेश कक्षा में नहीं आ पाया था। अगले दिन कक्षा में आने के बाद उसने अपने पिताजी से सुनी बातों को दोहराया। क्या आप रमेश को बता सकते हैं कि उसके इन बयानों में क्या गड़बड़ी है?
क. औरतें उसी तरह वोट देती हैं जैसा पुरुष उनसे कहते हैं इसलिए उनको मताधिकार देने का कोई मतलब नहीं है।
ख. पार्टी-पॉलिटिक्स से समाज में तनाव पैदा होता है। चुनाव में सबकी सहमति वाला फ़ैसला होना चाहिए, प्रतिद्वंद्विता नहीं होनी चाहिए।
ग. सिर्फ़ स्नातकों को ही चुनाव लड़ने की इजाज़त होनी चाहिए।
रमेश के बयानों में मौजूद गड़बड़ियाँ और उनके सही तर्क निम्नलिखित हैं:
क. यह बयान 'समानता' और 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' के लोकतांत्रिक सिद्धांत के खिलाफ है। महिलाएँ स्वतंत्र नागरिक हैं और उन्हें अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में गुप्त मतदान की व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति (महिला या पुरुष) बिना किसी दबाव के अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सके।
ख. यह कहना गलत है कि चुनावी प्रतिद्वंद्विता खराब है। वास्तव में, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ही नेताओं और पार्टियों को जनता की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करती है। यदि चुनाव में मुकाबला नहीं होगा, तो नेताओं के पास जनता के लिए काम करने का कोई ठोस कारण नहीं बचेगा और मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं होगा।
ग. लोकतंत्र में चुनाव लड़ने का अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से मिलना चाहिए। एक प्रतिनिधि के लिए सबसे बड़ी योग्यता जनता की समस्याओं को समझना और उनके हितों की रक्षा करना है, जिसके लिए केवल शैक्षिक डिग्री (स्नातक) होना अनिवार्य नहीं है। ऐसी शर्त लगाने से देश की एक बड़ी आबादी चुनाव लड़ने के मौलिक अधिकार से वंचित हो जाएगी, जो अलोकतांत्रिक है।