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सन् 1880 से 1920 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के वनाच्छादित क्षेत्... - भारत और समकालीन विश्व – I
सन् 1880 से 1920 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के वनाच्छादित क्षेत्र में 97 लाख हेक्टेयर की गिरावट आयी। पहले के 10.86 करोड़ हेक्टेयर से घटकर यह क्षेत्र 9.89 करोड़ हेक्टेयर रह गया था। इस गिरावट में निम्नलिखित कारकों की भूमिका बताएँ :
➢ रेलवे
➢ जहाज़ निर्माण
➢ कृषि-विस्तार
➢ व्यावसायिक खेती
➢ चाय-कॉफ़ी के बागान
➢ आदिवासी और किसान
सन् 1880 से 1920 के बीच वनों की गिरावट में विभिन्न कारकों की भूमिका निम्नलिखित थी:
रेलवे: रेल की पटरियों को बिछाने के लिए 'स्लीपरों' की भारी माँग थी। एक मील लंबी पटरी के लिए 1760 से 2000 स्लीपरों की ज़रूरत होती थी। इसके अलावा, रेल इंजनों में ईंधन के रूप में भी लकड़ी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ, जिससे जंगलों का तेजी से सफाया हुआ।
जहाज़ निर्माण: 19वीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में बलूत (ओक) के जंगल खत्म होने लगे थे। ब्रिटिश नौसेना के लिए मज़बूत जहाज़ों के निर्माण हेतु भारत से बड़े पैमाने पर 'टीक' और 'सागौन' जैसी लकड़ियों का निर्यात किया गया।
कृषि-विस्तार: औपनिवेशिक सरकार जंगलों को अनुत्पादक मानती थी क्योंकि उनसे राजस्व (Tax) नहीं मिलता था। खेती का रकबा बढ़ाकर भू-राजस्व प्राप्त करने के लिए सरकार ने जंगलों को काटकर उन्हें कृषि भूमि में बदलने को प्रोत्साहित किया।
व्यावसायिक खेती: यूरोप में औद्योगिक कच्चा माल और भोजन की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए नील, पटसन, गेहूँ और कपास जैसी नकदी फसलों के उत्पादन हेतु विशाल वन क्षेत्रों को साफ किया गया।
चाय-कॉफ़ी के बागान: यूरोप में चाय और कॉफ़ी की बढ़ती माँग को देखते हुए, औपनिवेशिक सरकार ने विशाल वन क्षेत्रों को बहुत सस्ती दरों पर यूरोपीय बागान मालिकों को सौंप दिया। इन क्षेत्रों की बाड़ेबंदी की गई और जंगलों को साफ कर बागान लगाए गए।
आदिवासी और किसान: जहाँ एक ओर अंग्रेज़ आदिवासियों की 'झूम खेती' को वनों के लिए हानिकारक मानते थे, वहीं दूसरी ओर बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की आपूर्ति हेतु किसानों ने भी वन भूमि को साफ कर खेती के दायरे को बढ़ाया। हालाँकि, वनों की असली बर्बादी औपनिवेशिक नीतियों के कारण हुई।