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बस्तर और जावा के औपनिवेशिक वन प्रबंधन में क्या समानताएँ हैं? - भारत और समकालीन विश्व – I
बस्तर और जावा के औपनिवेशिक वन प्रबंधन में क्या समानताएँ हैं?
बस्तर और जावा के औपनिवेशिक वन प्रबंधन में निम्नलिखित समानताएँ थीं:
सरकारी नियंत्रण: दोनों ही स्थानों (बस्तर में अंग्रेज और जावा में डच) पर औपनिवेशिक सरकारों ने जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया और ग्रामीणों के मुफ्त प्रवेश पर पाबंदी लगा दी।
झूम खेती पर प्रतिबंध: दोनों सरकारों ने झूम खेती (घुमंतू खेती) पर रोक लगा दी क्योंकि उनका मानना था कि इससे कीमती इमारती लकड़ियों को नुकसान पहुँचता है।
व्यापारिक उद्देश्य: वन प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य रेलवे लाइनों और जहाजों के निर्माण के लिए कीमती लकड़ियाँ (जैसे साल और सागौन) प्राप्त करना और मुनाफा कमाना था।
जबरन श्रम (बेगार): बस्तर में 'वन ग्रामों' के लोगों से जंगलों की सुरक्षा और कटाई के लिए मुफ्त काम लिया जाता था, वहीं जावा में 'ब्लैंडोंगडिएंस्टन' (Blandongdiensten) प्रणाली के तहत कर माफी के बदले ग्रामीणों से लकड़ी काटने और ढोने का काम लिया गया।
विद्रोह: दोनों ही क्षेत्रों में कड़े वन कानूनों के कारण स्थानीय समुदायों ने विद्रोह किया। बस्तर में 1910 का विद्रोह हुआ और जावा में 'सामिन आंदोलन' शुरू हुआ।