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औपनिवेशिक काल के वन प्रबंधन में आए परिवर्तनों ने इन समूहों को ... - भारत और समकालीन विश्व – I
औपनिवेशिक काल के वन प्रबंधन में आए परिवर्तनों ने इन समूहों को कैसे प्रभावित किया :
➢ झूम खेती करने वालों को
➢ घुमंतू और चरवाहा समुदायों को
➢ लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को
➢ बागान मालिकों को
➢ शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज़ अफ़सरों को
औपनिवेशिक काल के वन प्रबंधन में आए परिवर्तनों का विभिन्न समूहों पर प्रभाव निम्नलिखित था:
झूम खेती करने वालों को: अंग्रेज़ों ने झूम खेती (घुमंतू खेती) पर रोक लगा दी क्योंकि उन्हें डर था कि इससे कीमती लकड़ियाँ जल जाएँगी और आग फैलने का खतरा रहेगा। इसके कारण कई समुदायों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया और उन्हें मजबूरन अपना पेशा बदलना पड़ा।
घुमंतू और चरवाहा समुदायों को: नए वन कानूनों ने चरवाहों के जंगलों में प्रवेश और पशु चराने पर पाबंदी लगा दी। उनके आने-जाने के रास्ते बंद हो गए। कई समुदायों को 'अपराधी कबीला' घोषित कर दिया गया, जिससे उनकी आजीविका पूरी तरह नष्ट हो गई।
लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को: इन्हें बहुत लाभ हुआ। सरकार ने निजी कंपनियों को जंगलों के बड़े हिस्सों से लकड़ी काटने और वन-उत्पादों के व्यापार का एकाधिकार (Exclusive rights) दे दिया, जिससे उन्होंने भारी मुनाफा कमाया।
बागान मालिकों को: यूरोपीय बागान मालिकों को बहुत कम कीमत पर जंगलों की ज़मीन दे दी गई। सरकार ने चाय, कॉफी और रबड़ के बागान लगाने के लिए जंगलों को साफ करवाया और इन मालिकों को सस्ता श्रम और ज़मीन उपलब्ध कराई।
शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज़ अफ़सरों को: जहाँ वन कानूनों ने आम जनता के लिए शिकार पर पाबंदी लगा दी, वहीं राजाओं और अंग्रेज़ अफ़सरों के लिए 'बड़े शिकार' (जैसे शेर, बाघ) को खेल के रूप में प्रोत्साहित किया गया। अंग्रेज़ों ने खतरनाक जानवरों को मारने पर इनाम दिए, जिससे हजारों जानवरों का बेरहमी से शिकार किया गया।