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जब मधुरिमा संपत्ति के पंजीकरण वाले दफ़्तर में गई तो रजिस्ट्रार... - लोकतांत्रिक राजनीति
जब मधुरिमा संपत्ति के पंजीकरण वाले दफ़्तर में गई तो रजिस्ट्रार ने कहा, "आप अपना नाम मधुरिमा बनर्जी, बेटी ए.के. बनर्जी नहीं लिख सकतीं। आप शादीशुदा हैं और आपको अपने पति का ही नाम देना होगा। फिर आपके पति का उपनाम तो राव है। इसलिए आपका नाम भी बदलकर मधुरिमा राव हो जाना चाहिए।" मधुरिमा इस बात से सहमत नहीं हुई। उसने कहा, "अगर शादी के बाद मेरे पति का नाम नहीं बदला तो मेरा नाम क्यों बदलना चाहिए? अगर वह अपने नाम के साथ पिता का नाम लिखते रह सकते हैं तो मैं क्यों नहीं लिख सकती?" आपकी राय में इस विवाद में किसका पक्ष सही है? और क्यों?
मेरी राय में इस विवाद में मधुरिमा का पक्ष सही है।
इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:
समानता का अधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के अनुसार, लिंग के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। यदि पुरुष को शादी के बाद अपना नाम या उपनाम बदलने की जरूरत नहीं है, तो महिला पर ऐसा दबाव बनाना लैंगिक असमानता को दर्शाता है।
व्यक्तिगत पहचान और स्वतंत्रता: हर व्यक्ति को अपनी पहचान (Identity) चुनने का अधिकार है। संविधान में ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी महिला को शादी के बाद पति का उपनाम अपनाने के लिए मजबूर करता हो।
भेदभावपूर्ण व्यवहार: रजिस्ट्रार का यह कहना कि मधुरिमा को अपने पति का नाम देना होगा, एक रूढ़िवादी और भेदभावपूर्ण सोच है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है।
निष्कर्ष: मधुरिमा को पूरा अधिकार है कि वह अपनी पहचान अपने पिता के नाम के साथ रखे या अपने पति के नाम के साथ, यह उसकी अपनी पसंद होनी चाहिए।