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मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पिपरिया में हजारों आदिवासी और... - लोकतांत्रिक राजनीति
मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पिपरिया में हजारों आदिवासी और जंगल में रहने वाले लोग सतपुड़ा राष्ट्रीय पार्क, बोरी वन्यजीव अभ्यारण्य और पंचमढ़ी वन्यजीव अभ्यारण्य से अपने प्रस्तावित विस्थापन का विरोध करने के लिए जमा हुए। उनका कहना था कि यह विस्थापन उनकी जीविका और उनके विश्वासों पर हमला है। सरकार का दावा है कि इलाके के विकास और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए उनका विस्थापन ज़रूरी है। जंगल पर आधारित जीवन जीने वाले की तरफ़ से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक पत्र, इस मसले पर सरकार द्वारा दिया जा सकने वाला संभावित जवाब और इस मामले पर मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट तैयार करो।
1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को आदिवासियों का पत्र
सेवा में,
अध्यक्ष,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली।
विषय: सतपुड़ा राष्ट्रीय पार्क और अभ्यारण्यों से अवैध विस्थापन के विरुद्ध शिकायत।
महोदय,
हम होशंगाबाद जिले के पिपरिया क्षेत्र के हज़ारों आदिवासी इस पत्र के माध्यम से अपनी पीड़ा व्यक्त करना चाहते हैं। सरकार हमें सतपुड़ा राष्ट्रीय पार्क और बोरी तथा पंचमढ़ी अभ्यारण्यों से जबरन विस्थापित करने की योजना बना रही है।
जंगल हमारे लिए केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि हमारी जीविका और हमारे पूर्वजों के विश्वास का आधार है। हमें यहाँ से हटाना हमारे गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है। जंगल के बिना हम अपनी संस्कृति और अस्तित्व खो देंगे।
अतः आपसे प्रार्थना है कि इस विस्थापन को तुरंत रोका जाए और हमें अपनी पैतृक भूमि पर रहने का अधिकार दिया जाए।
विनीत,
पिपरिया क्षेत्र के समस्त आदिवासी समूह।
2. सरकार का संभावित जवाब
सेवा में,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली।
विषय: वन्यजीव संरक्षण हेतु विस्थापन के संबंध में स्पष्टीकरण।
महोदय,
सरकार वन्यजीवों के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। सतपुड़ा राष्ट्रीय पार्क और संबंधित अभ्यारण्यों में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से दुर्लभ वन्यजीवों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत, इन क्षेत्रों को मानवीय गतिविधियों से मुक्त रखना आवश्यक है। सरकार आदिवासियों की जीविका के प्रति संवेदनशील है, इसलिए उनके लिए उचित मुआवजे और वैकल्पिक स्थान पर पुनर्वास (Rehabilitation) की विस्तृत योजना तैयार की गई है। यह कदम देश के व्यापक हित और पर्यावरण की रक्षा के लिए अनिवार्य है।
हस्ताक्षर,
सचिव, वन एवं पर्यावरण विभाग।
3. मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जाँच रिपोर्ट
प्रकरण संख्या: [ABC/2025]
विषय: आदिवासियों का विस्थापन बनाम वन्यजीव संरक्षण।
जाँच के मुख्य बिंदु:
आयोग ने पाया कि प्रस्तावित विस्थापन से हजारों आदिवासियों की आजीविका और उनकी प्राचीन संस्कृति पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
सरकार का वन्यजीव संरक्षण का तर्क कानूनी रूप से वैध है, परंतु यह मानवीय गरिमा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
आदिवासियों को विस्थापित करने से पहले उनकी सहमति और बेहतर पुनर्वास की स्पष्ट कमी देखी गई है।
आयोग की सिफारिशें:
सरकार को आदिवासियों के साथ बैठकर संवाद करना चाहिए और 'न्यूनतम विस्थापन' का विकल्प तलाशना चाहिए।
जब तक पुनर्वास स्थल पर बुनियादी सुविधाएँ (घर, स्कूल, अस्पताल) तैयार न हो जाएँ, तब तक किसी को हटाया न जाए।
आदिवासियों को जंगल के कोर क्षेत्रों से बाहर लेकिन उनके सांस्कृतिक परिवेश के पास ही बसाया जाए।
वन्यजीवों के संरक्षण में आदिवासियों की भूमिका को भी शामिल करने पर विचार किया जाए।
दिनांक: 28 दिसंबर, 2025
हस्ताक्षर,
अध्यक्ष, मानवाधिकार आयोग।