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1912 में प्रकाशित ‘विवाहित महिलाओं के लिए आचरण’ पु... - लोकतांत्रिक राजनीति
1912 में प्रकाशित ‘विवाहित महिलाओं के लिए आचरण’ पुस्तक के निम्नलिखित अंश को पढ़ें:
“ईश्वर ने औरत जाति को शारीरिक और भावनात्मक, दोनों ही तरह से ज़्यादा नाजुक बनाया है। उन्हें आत्म रक्षा के भी योग्य नहीं बनाया है। इसलिए ईश्वर ने ही उन्हें जीवन भर पुरुषों के संरक्षण में रहने का भाग्य दिया है-कभी पिता के, कभी पति के और कभी पुत्र के। इसलिए महिलाओं को निराश होने की जगह इस बात से अनुगृहीत होना चाहिए कि वे अपने आपको पुरुषों की सेवा में समर्पित कर सकती हैं।” क्या इस अनुच्छेद में व्यक्त मूल्य संविधान के दर्शन से मेल खाते हैं या वे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ़ हैं?
इस अनुच्छेद में व्यक्त मूल्य भारतीय संविधान के दर्शन के पूरी तरह से खिलाफ (विरोधी) हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
समानता का अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 और 15 सभी नागरिकों को समान मानता है और लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव को रोकता है। जबकि यह अनुच्छेद महिलाओं को पुरुषों से कमतर और उनके अधीन बताता है।
व्यक्ति की गरिमा: संविधान की प्रस्तावना 'व्यक्ति की गरिमा' सुनिश्चित करने की बात करती है। महिलाओं को केवल सेवा के लिए बना मानना और उन्हें दूसरों के संरक्षण पर निर्भर बताना उनकी मानवीय गरिमा के विरुद्ध है।
स्वतंत्रता: संविधान महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और अपनी पसंद का जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है, जबकि यह अनुच्छेद उन्हें जीवन भर पुरुषों के नियंत्रण में रखने की वकालत करता है।
न्याय: यह अनुच्छेद सामाजिक न्याय के उस सिद्धांत के खिलाफ है जो महिलाओं को समाज में बराबर का दर्जा और अवसर देने की बात करता है।
निष्कर्ष: संविधान एक ऐसी व्यवस्था बनाता है जहाँ महिलाएँ स्वावलंबी और स्वतंत्र हैं, जबकि यह अनुच्छेद उन्हें परावलंबी और दासता की स्थिति में रखने का समर्थन करता है।